हिन्दी नाटक में वृद्ध सिंवेदनाएँ: पारिवारिक उपेक्षा का अध्ययन
Keywords:
वृद्ध संवेदनाएँ, हिन्दी नाटक, पारिवारिक उपेक्षा, वृद्ध-विमर्श, पीढ़ीगत संघर्ष, सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक विघटन, भावनात्मक अकेलापन, आधुनिक समाज, मानवीय मूल्य, वृद्धावस्था, सामाजिक चेतना, पारिवारिक संबंध, सांस्कृतिक परिवर्तन, आधुनिक पारिवारिक संरचनाAbstract
आधुनिक भारतीय समाज में पारिवारिक संरचना, सामाजिक मूल्यों और जीवन-शैली में तीव्र परिवर्तन के कारण वृद्धजन अनेक प्रकार की मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था के विघटन, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति, भौतिकवादी दृष्टिकोण तथा पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी ने वृद्धों की स्थिति को अधिक संवेदनशील बना दिया है। हिन्दी नाटक, समाज का दर्पण होने के कारण, इन परिवर्तनों और उनके प्रभावों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करता है। प्रस्तुत अध्ययन “हिन्दी नाटक में वृद्ध संवेदनाएँ: पारिवारिक उपेक्षा का अध्ययन” हिन्दी नाटकों में वृद्ध पात्रों की मानसिक स्थिति, भावनात्मक पीड़ा, सामाजिक अकेलेपन तथा पारिवारिक उपेक्षा के विभिन्न आयामों का विश्लेषण करता है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि हिन्दी नाटककारों ने बदलते पारिवारिक संबंधों, पीढ़ीगत संघर्षों और आधुनिक जीवन की स्वार्थपरक प्रवृत्तियों के बीच वृद्धों की संवेदनाओं को किस प्रकार प्रस्तुत किया है। अध्ययन में यह भी विश्लेषित किया गया है कि वृद्ध पात्र केवल करुणा के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक मूल्यों, पारिवारिक नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि भी हैं। शोध में चयनित हिन्दी नाटकों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि वृद्धावस्था की समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संकट का संकेत है। अध्ययन में वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध-पद्धति का प्रयोग किया गया है। विभिन्न हिन्दी नाटकों, आलोचनात्मक ग्रंथों, शोध-पत्रों तथा सामाजिक अध्ययनों के आधार पर यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि आधुनिक परिवारों में वृद्धों की उपेक्षा एक गंभीर सामाजिक समस्या के रूप में उभर रही है। हिन्दी नाटक इस समस्या को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों के संरक्षण के प्रश्न के रूप में भी प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन हिन्दी नाटक में वृद्ध-विमर्श को नई दृष्टि प्रदान करने के साथ-साथ समाज में वृद्धजनों के प्रति संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।
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