समकालीन कविता में विकलांग विमर्श: आत्मसम्मान और सामाजिक संघर्ष
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समकालीन हिंदी कविता, विकलांग विमर्श, आत्मसम्मान, सामाजिक संघर्ष, अस्मिता चेतना, सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा, दिव्यांग संवेदना, साहित्यिक विमर्श, समावेशी समा, सामाजिक उपेक्षा, संघर्षशील जीवन, संवेदनात्मक अभिव्यक्ति, हाशिये का समाज, आधुनिक हिंदी साहित्यAbstract
समकालीन हिंदी कविता में विकलांग विमर्श एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक एवं साहित्यिक चेतना के रूप में उभरकर सामने आया है। यह विमर्श केवल शारीरिक अक्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के आत्मसम्मान, सामाजिक पहचान, अधिकार-बोध तथा संघर्षशील जीवन को भी अभिव्यक्ति प्रदान करता है। लंबे समय तक साहित्य में विकलांग व्यक्तियों को दया, करुणा और निर्भरता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया जाता रहा, किंतु आधुनिक हिंदी कविता में यह दृष्टिकोण बदलता दिखाई देता है। समकालीन कवियों ने विकलांग व्यक्ति को संवेदनशील, आत्मनिर्भर और संघर्षशील मानव के रूप में प्रस्तुत किया है, जो समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। इस अध्ययन में समकालीन हिंदी कविता में उपस्थित विकलांग विमर्श का विश्लेषण आत्मसम्मान और सामाजिक संघर्ष के संदर्भ में किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि हिंदी कविता किस प्रकार विकलांग व्यक्तियों की मानसिक पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा, असमानता, पारिवारिक व्यवहार तथा उनके आत्मविश्वास को अभिव्यक्त करती है। साथ ही यह भी देखा गया है कि कविता सामाजिक चेतना को जागृत करने तथा विकलांग व्यक्तियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण विकसित करने में किस प्रकार सहायक सिद्ध होती है। अध्ययन के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि समकालीन कविता विकलांगता को कमजोरी के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के संघर्ष और आत्मबल की दृष्टि से प्रस्तुत करती है। कविता में विकलांग व्यक्ति अपने अधिकारों, सम्मान और समान अवसरों की माँग करता दिखाई देता है। यह विमर्श समाज की रूढ़ मानसिकता को चुनौती देता है तथा समावेशी और संवेदनशील सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इस प्रकार समकालीन हिंदी कविता में विकलांग विमर्श सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान की स्थापना की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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